Nishkalank Mahadev Temple: यहाँ मौजूद है समंदर की लहरों में छिपा कलियुग का सबसे तीर्थ…
Nishkalank Mahadev Temple: गुजरात के भावनगर के पास कोलियाक तट पर स्थित निष्कलंक महादेव मंदिर आस्था का एक ऐसा केंद्र है, जो इंसानी सोच और विज्ञान की समझ से परे है। इसे भारतीय संस्कृति में वर्णित (Sacred Hidden Pilgrimage) उन पांच गुप्त तीर्थों में से एक माना जाता है, जिनका उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। मान्यता है कि कुल पांच गुप्त तीर्थों में से केवल तीन ही अब तक प्रकट हुए हैं, जिनमें रूपेश्वर महादेव, स्तंभेश्वर महादेव और निष्कलंक महादेव शामिल हैं। शेष दो तीर्थ आज भी रहस्यों के गर्भ में छिपे हुए हैं और दुनिया के सामने नहीं आए हैं।

समुद्र की लहरों में समाहित पांच शिवलिंग
इस मंदिर की सबसे चौंकाने वाली विशेषता इसका भौगोलिक स्थान और ज्वार-भाटे का चक्र है। दिन के 24 घंटों में से लगभग 14 घंटे यह पूरा (Ancient Underwater Temple) मंदिर अरब सागर की लहरों के नीचे पूरी तरह समा जाता है। समुद्र के बीचों-बीच स्थित इन पांच शिवलिंगों के ऊपर से जब विशाल लहरें गुजरती हैं, तो बाहर केवल मंदिर की ऊंची ध्वज पताका ही नजर आती है। भक्त केवल कम ज्वार के समय ही समुद्र के अंदर चलकर इन शिवलिंगों के दर्शन कर पाते हैं, जो किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।
महाभारत काल और पांडवों का प्रायश्चित
निष्कलंक महादेव का इतिहास सीधा महाभारत के भीषण युद्ध से जुड़ा हुआ है। युद्ध समाप्त होने के बाद जब पांडवों को अपने ही सगे-संबंधियों के वध का भारी दुख हुआ, तो वे (Sins Redemption Ritual) पापों से मुक्ति का मार्ग खोजने लगे। भगवान श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में वे गुजरात के कोलियाक तट पर पहुंचे। यहां उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने पांचों भाइयों को पांच अलग-अलग शिवलिंगों के रूप में साक्षात् दर्शन दिए। इसी कारण यहां पांच शिवलिंग और पांचों के साथ नंदी महाराज की मूर्तियां स्थापित हैं।
मोक्षदायिनी राख और अटूट परंपराएं
भक्तों के बीच यह गहरा विश्वास है कि यह स्थान न केवल पापों का नाश करता है बल्कि आत्मा को शांति भी प्रदान करता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु (Moksha Spiritual Beliefs) अपने प्रियजनों की चिता की राख को शिवलिंग पर स्पर्श कराकर जल में प्रवाहित करते हैं, ताकि पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति हो सके। पूजा के दौरान महादेव को भस्म, दूध, दही और नारियल अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। समुद्र की गोद में होने के बावजूद यहाँ की सादगी भक्तों को अलौकिक शांति का अनुभव कराती है।
भाद्रवी मेले का ऐतिहासिक उल्लास
भाद्रपद महीने की अमावस्या के अवसर पर यहाँ एक विशाल आयोजन होता है, जिसे भाद्रवी मेला कहा जाता है। इस मेले की शुरुआत मंदिर पर नई (Religious Flag Ceremony) ध्वज पताका फहराने के साथ होती है। हैरानी की बात यह है कि पूरे साल समुद्र के भीषण थपेड़ों और तेज हवाओं के बीच भी यह ध्वज पताका सुरक्षित रहती है। अमावस्या के दिन यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं, जो समुद्र के पानी के उतरने का इंतजार करते हैं ताकि वे महादेव के चरणों में अपना शीश नवा सकें।
कलियुग में प्रकट हुआ गुप्त महादेव मंदिर
पुरातन कथाओं के अनुसार, निष्कलंक महादेव का यह पवित्र स्थान कई सदियों तक समुद्र की गहराइयों में गुप्त रूप से विद्यमान था। समय बीतने के साथ यह (Mysterious Temple Revelation) स्थान प्रकट हुआ और आज यह दुनिया भर के शिव भक्तों के लिए कौतूहल और श्रद्धा का विषय बना हुआ है। यह मंदिर हमें सिखाता है कि जब भक्ति सच्ची हो, तो महादेव स्वयं प्रकट होकर अपने भक्तों के कलंक मिटा देते हैं। आज भी श्रद्धालु यहाँ आकर अपनी आत्मा की शुद्धि और जीवन की नई शुरुआत का आशीर्वाद मांगते हैं।

