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Lord Hayagriva Avatar Story: जानें क्या है श्रीहरि के हयग्रीव अवतार का रहस्य, जब अरक्षा और अधर्म का हुआ विनाश…

Lord Hayagriva Avatar Story: सृष्टि के प्रारंभ में जब परमपिता ब्रह्मा योगनिद्रा में लीन थे, तब ब्रह्मांड एक गहरे संकट की ओर बढ़ रहा था। भागवत पुराण के पन्नों में दर्ज यह कथा बताती है कि उस समय हयग्रीव नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर (Hindu Mythology) सक्रिय था। कुछ विद्वान उसे दैत्य कुल का मानते हैं, हालांकि दैत्य वंश का उदय बाद के कालखंड में महर्षि कश्यप और दिति से हुआ था। उस असुर ने अवसर पाकर ब्रह्मा जी के पास रखे पवित्र वेदों को चुरा लिया और समुद्र की अतल गहराइयों में जाकर छिप गया। वेदों के अभाव में संसार से ज्ञान का प्रकाश लुप्त होने लगा और चारों ओर अज्ञानता का अंधकार छा गया।

Lord hayagriva avatar story
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मत्स्य रूप में नारायण और पहले हयग्रीव का संहार

सृष्टि को अंधकार से उबारने के लिए ब्रह्मा जी ने श्रीहरि विष्णु से गुहार लगाई। प्रलय का समय निकट था और संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न होने वाली थी। इसी संकट काल में भगवान विष्णु ने अपना प्रथम अवतार (Lord Vishnu Avatars) धारण किया, जिसे मत्स्य अवतार कहा जाता है। भगवान ने विशाल मछली का रूप लेकर न केवल स्वयंभू मनु और सप्तर्षियों की रक्षा की, बल्कि समुद्र के भीतर छिपे उस हयग्रीव नामक असुर का वध भी कर दिया। इस प्रकार भगवान ने वेदों को पुनः प्राप्त कर ब्रह्मा जी को सौंपा और ज्ञान की परंपरा को जीवित रखा।

मधु और कैटभ का अंत और घोड़े के सिर वाले अद्भुत स्वरूप का प्राकट्य

असुरों के अंत की एक और अलौकिक गाथा भगवान विष्णु के कानों के मैल से उत्पन्न मधु और कैटभ नामक असुरों से जुड़ी है। जब ब्रह्मा जी वेदों के माध्यम से सृष्टि का सृजन कर रहे थे, तब इन दोनों असुरों ने उन ध्वनियों को चुरा लिया और पाताल लोक में जाकर छिप गए। इस विषम परिस्थिति में नारायण ने एक विलक्षण रूप धारण किया, जिसका मस्तक अश्व का और शरीर मनुष्य का था (Lord Hayagriva Origin)। हयग्रीव शब्द का शाब्दिक अर्थ ही ‘अश्व की गर्दन वाला’ होता है। इस स्वरूप में भगवान ने उन असुरों से भीषण युद्ध किया और उनका अंत कर वेदों की मर्यादा पुनः स्थापित की।

सुदर्शन चक्र से हुए बारह टुकड़े और मेदिनी बनी हमारी पृथ्वी

मधु और कैटभ का वध कोई साधारण घटना नहीं थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इन असुरों का विनाश करने के लिए स्वयं महादेव ने श्रीहरि को अपना अमोघ सुदर्शन चक्र प्रदान किया था। भगवान हयग्रीव ने (Spiritual Significance) उस चक्र से दोनों असुरों के छह-छह टुकड़े कर दिए, जिनमें दो सिर, दो धड़, चार हाथ और चार पैर शामिल थे। इन असुरों के अवशेष जब पृथ्वी पर गिरे, तो उनसे भूमि की बारह परतों का निर्माण हुआ। उनके शरीर के ‘मेद’ यानी वसा के गिरने के कारण ही हमारी इस वसुंधरा का नाम ‘मेदिनी’ पड़ा।

माता लक्ष्मी का श्राप और एक मायावी वरदान का खेल

हयग्रीव से जुड़ी सबसे रहस्यमयी कथा महाभारत में वर्णित है। महर्षि कश्यप और दक्ष की पुत्री से उत्पन्न एक दानव ने, जिसका नाम भी हयग्रीव था, कठोर तपस्या के बल पर माता पार्वती से यह वरदान पा लिया कि उसकी मृत्यु केवल ‘हयग्रीव’ के हाथों ही संभव होगी। स्वयं को अमर मानकर उसने स्वर्ग और पृथ्वी पर कोहराम मचा दिया। इसी दौरान एक बार नारायण माता लक्ष्मी को देखकर मुस्कुराने लगे, जिसे लक्ष्मी जी ने अपना उपहास समझा और क्रोधवश उन्हें मस्तक विहीन होने का श्राप (Goddess Laxmi Curse) दे दिया। यह श्राप वास्तव में उस दानव के अंत की ईश्वरीय योजना का हिस्सा था।

धनुष की प्रत्यंचा और वह कर्णभेदी स्वर जिसने हिला दी पूरी सृष्टि

जब देवताओं ने देखा कि हयग्रीव का अत्याचार चरम पर है, तो वे ब्रह्मा जी की शरण में गए। उस समय श्रीहरि अपने धनुष ‘शार्ङ्ग’ की प्रत्यंचा पर मस्तक टिकाकर विश्राम कर रहे थे। देवताओं के अनुरोध पर ब्रह्मा जी ने एक कीड़े को उत्पन्न किया जिसने धनुष की डोरी को काट दिया। प्रत्यंचा के अचानक टूटने से एक भयंकर ध्वनि (Vedic Wisdom) गूँजी और उसी के वेग से श्रीहरि की गर्दन धड़ से अलग हो गई। माता लक्ष्मी का श्राप फलीभूत हो चुका था और देवता भयभीत थे कि अब बिना मस्तक के नारायण उस दुष्ट दानव का संहार कैसे करेंगे।

अश्विनीकुमारों का चमत्कार और दानव हयग्रीव का अंतिम समय

संकट के उस क्षण में माता पार्वती ने देवताओं को उस दानव के वरदान के बारे में बताया। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि भगवान के धड़ पर अश्व का मुख लगा दिया जाए, तो वे हयग्रीव कहलाएंगे और वरदान के अनुसार वध संभव हो सकेगा। ब्रह्मा जी के आदेश पर देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों ने (Ancient Healing) एक नीले रंग के अश्व का मुख श्रीहरि के धड़ पर जोड़ दिया। इस दिव्य अवतार ने तुरंत उस अत्याचारी दानव को चुनौती दी। अंततः माता पार्वती के वरदान की मर्यादा रखते हुए भगवान हयग्रीव ने उस असुर का वध किया और देवताओं को भयमुक्त किया।

रावण की सेना का वह योद्धा जिसका इतिहास में कम ही जिक्र है

इतिहास और पुराणों की जटिलता यहाँ समाप्त नहीं होती। हयग्रीव नाम का एक पात्र रामायण काल में भी दिखाई देता है। वह रावण की विशाल सेना का एक अत्यंत वीर सेनापति था। युद्ध के मैदान में उसने अपनी वीरता का परिचय दिया और लंका की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। हालांकि विभिन्न ग्रंथों में उसकी मृत्यु के सटीक कारक को लेकर (Ancient Indian History) अनेक मतभेद हैं, लेकिन वह असुर शक्ति के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में दर्ज है। इस प्रकार हयग्रीव नाम केवल एक अवतार का नहीं, बल्कि संघर्ष और धर्म की स्थापना की एक बहुआयामी गाथा का प्रतीक है।

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