Chamunda Nandikeshwar Dham : आस्था, पौराणिक कथा और अद्भुत परंपराओं का जीवंत संगम
Chamunda Nandikeshwar Dham: मां शक्ति के उग्र और करुणामय स्वरूप मां चामुंडा का यह पावन धाम हिमाचल की देवभूमि में आस्था का एक अनूठा केंद्र है। यह स्थल केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि देवी और देव के संतुलन, श्रद्धा और लोकमान्यताओं का सजीव उदाहरण माना जाता है। यहां हर वर्ष देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।

मां चामुंडा का दिव्य स्वरूप और धाम का महत्व
मां चामुंडा को शक्ति का वह रूप माना जाता है, जिन्होंने चंड और मुंड जैसे अत्याचारी राक्षसों का संहार कर संसार को भय से मुक्त किया। इसी कारण उनका नाम चामुंडा पड़ा। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित यह धाम प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ है। बनेर खड्ड के तट पर बसे इस स्थान की शांति और ऊर्जा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती है। यहां मां चामुंडा के साथ भगवान शिव भी पिंडी स्वरूप में विराजमान हैं, इसलिए इसे चामुंडा नंदिकेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि यह स्थान शिव और शक्ति का संयुक्त निवास है, जहां वे विश्राम करते हैं।
मां के क्रोध और भगवान शिव की लीला की पौराणिक कथा
चंड और मुंड के वध के बाद मां चामुंडा अत्यंत उग्र हो गई थीं। उनके क्रोध से आसपास के लोग भयभीत रहने लगे। कहा जाता है कि देवी के प्रकोप को शांत करने के लिए लोग बलि की परंपरा अपनाने को विवश हो गए। एक दिन एक महिला के पुत्र की बारी आई, जिसे उसने भगवान शिव की आराधना से प्राप्त किया था। मां से भयभीत होते हुए भी उस स्त्री ने पुत्र को बलि के लिए भेज दिया और मन ही मन शिव से उसकी रक्षा की प्रार्थना करती रही।
कथा के अनुसार, भगवान शिव ने बालक का रूप धारण कर उस बच्चे को मार्ग में रोक लिया और उससे खेलने लगे। जब बलि में देरी हुई तो मां चामुंडा का क्रोध और बढ़ गया। वे स्वयं वहां पहुंचीं, जहां शिव बालक रूप में उपस्थित थे। बच्चे ने मां से कहा कि वह तो आ रहा था, पर इस बालक ने उसे रोक लिया। यह सुनकर देवी और अधिक क्रोधित हुईं और शिव का पीछा करने लगीं।
पांच शिलाओं की कथा और शिव-शक्ति का मिलन
मां चामुंडा ने शिव पर क्रोधवश पांच विशाल पत्थर फेंके। मान्यता है कि ये शिलाएं आज भी वहां विद्यमान हैं। उनमें से एक शिला को भगवान शिव ने अपनी उंगली पर उठा लिया। यह दृश्य देखकर मां को आभास हुआ कि सामने कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं महादेव हैं। तभी उनका क्रोध शांत हुआ और उन्होंने शिव से क्षमा मांगी। इसके पश्चात शिव ने उसी स्थान पर स्वयं और मां चामुंडा को विराजमान होने का वरदान दिया। यहीं से इस धाम की स्थापना की पौराणिक मान्यता जुड़ी है।
हर दिन जलने वाला शव या प्रतीकात्मक पुतला
इस धाम की सबसे अनोखी परंपरा मोक्षधाम से जुड़ी है। मान्यता है कि यदि किसी दिन यहां किसी मृत व्यक्ति का दाह संस्कार नहीं होता, तो प्रतीक रूप में घास का पुतला जलाया जाता है। यह परंपरा उसी प्राचीन कथा की स्मृति मानी जाती है, जब बलि की परंपरा को शिव ने करुणा में बदल दिया। आज दूर-दूर के गांवों से लोग अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए यहां आते हैं, क्योंकि इसे मोक्षदायिनी भूमि माना जाता है।
मां चामुंडा धाम तक पहुंचने का मार्ग
यह मंदिर धर्मशाला से लगभग पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और धर्मशाला-पालमपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप है। सड़क मार्ग से यहां बस और टैक्सी दोनों सुविधाएं उपलब्ध हैं। रेल मार्ग से आने वाले श्रद्धालु पठानकोट-जोगिंद्रनगर रेल लाइन पर कांगड़ा या मारंडा स्टेशन उतरकर आगे की यात्रा कर सकते हैं। हवाई मार्ग से आने के लिए गगल हवाई अड्डा सबसे निकट है, जो लगभग तीस किलोमीटर दूर स्थित है।
आरती, श्रृंगार और दैनिक पूजा विधि
मां चामुंडा की आरतियों और श्रृंगार का विशेष महत्व है। गर्मियों में प्रातः और सायं स्नान तथा श्रृंगार किया जाता है, जबकि सर्दियों में समय में थोड़ा परिवर्तन होता है। आरती के निश्चित समय पर मंदिर में भक्तों की उपस्थिति से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। शैय्या आरती के साथ ही मंदिर परिसर में दिनभर की पूजा का समापन होता है।
यह धाम केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और लोककथाओं का जीवंत प्रतीक है, जो हर श्रद्धालु को आध्यात्मिक शांति और विश्वास प्रदान करता है।

