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Four daughters of Mithila : माता सीता और उनकी तीन बहनों की त्यागमयी गाथा

Four daughters of Mithila: रामायण की कथा केवल श्रीराम और माता सीता के जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सभी पात्रों की कहानी है जिन्होंने मौन रहकर धर्म, कर्तव्य और त्याग का पालन किया। माता सीता के साथ जन्मी और पली-बढ़ी उनकी तीन बहनें ऊर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति भी इसी परंपरा की सशक्त प्रतिनिधि थीं। इन चारों बहनों का जीवन भारतीय नारी के आदर्श स्वरूप को दर्शाता है। वे केवल राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि अपने आचरण, धैर्य और समर्पण से उन्होंने इतिहास में एक अमिट स्थान बनाया। मिथिला की इन चार बेटियों का विवाह अयोध्या के चार राजकुमारों से हुआ और इसी के साथ दो महान कुलों का आध्यात्मिक मिलन भी संपन्न हुआ।

Four daughters of mithila

सीता माता का परिचय और बहनों का पारिवारिक संदर्भ
माता सीता को राजा जनक की दत्तक पुत्री माना जाता है, जिन्हें हल चलाते समय धरती से प्राप्त किया गया था। इसी कारण उन्हें भूमिजा कहा जाता है। वे करुणा, पवित्रता और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति थीं। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सीता माता की तीन सगी बहनें थीं, जिनके नाम ऊर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति थे। चारों बहनें एक ही परिवार में पली-बढ़ीं और एक ही समय में अयोध्या के राजकुमारों से विवाह हुआ। यह संयोग भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में अद्वितीय माना जाता है, क्योंकि इससे पारिवारिक एकता और धर्म की भावना और अधिक सुदृढ़ हुई।

ऊर्मिला का त्याग और मौन साधना
ऊर्मिला लक्ष्मण की पत्नी थीं और त्याग की सजीव प्रतिमा मानी जाती हैं। जब श्रीराम वनवास के लिए गए और लक्ष्मण उनके साथ चले, तब ऊर्मिला ने भी साथ जाने की इच्छा प्रकट की। किंतु राज्य और परिवार की जिम्मेदारियों को देखते हुए लक्ष्मण ने उन्हें अयोध्या में ही रहने का आग्रह किया। ऊर्मिला ने बिना किसी विरोध के इस निर्णय को स्वीकार किया। लोककथाओं के अनुसार लक्ष्मण ने चौदह वर्षों तक निद्रा का त्याग किया ताकि वे निरंतर राम और सीता की सेवा कर सकें। उस अवधि में ऊर्मिला ने लक्ष्मण की नींद अपने ऊपर ले ली और स्वयं दीर्घकाल तक समाधिस्थ अवस्था में रहीं। यह त्याग न केवल पति-भक्ति का उदाहरण है, बल्कि आत्मसंयम और तपस्या की भी चरम सीमा को दर्शाता है।

मांडवी का संयम और सहचर्य
मांडवी राजा कुशध्वज की पुत्री थीं और उनका विवाह भरत से हुआ था। उनका जीवन संयम और सहचर्य का प्रतीक माना जाता है। जब भरत ने राजसिंहासन स्वीकार करने से इनकार कर दिया और नंदीग्राम में तपस्वी जीवन अपनाया, तब मांडवी ने भी उसी जीवनशैली को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं को त्यागकर अपने पति के साथ सादा जीवन बिताया। मांडवी ने कभी भी अपने भाग्य पर प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि पति के धर्म और भाई के प्रति उनकी निष्ठा को ही अपना मार्ग माना। उनका यह आचरण बताता है कि सच्चा दांपत्य केवल साथ रहने में नहीं, बल्कि समान विचार और त्याग में निहित होता है।

श्रुतकीर्ति की सौम्यता और कर्तव्यनिष्ठा
श्रुतकीर्ति शत्रुघ्न की पत्नी थीं और चारों बहनों में सबसे छोटी मानी जाती हैं। उनका स्वभाव सौम्य, विनम्र और धर्मपरायण था। शत्रुघ्न ने अपने बड़े भाइयों के प्रति सदैव सेवा और निष्ठा का भाव रखा। जब उन्हें राज्य और प्रजा की रक्षा का दायित्व मिला, तब श्रुतकीर्ति ने हर कदम पर उनका साथ दिया। वे परिवार की मर्यादा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। रामायण में उनका उल्लेख सीमित रूप में मिलता है, किंतु उनका जीवन यह सिखाता है कि शांत और संतुलित आचरण भी समाज की नींव को मजबूत करता है।

चारों बहनों का सामूहिक महत्व
माता सीता, ऊर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति का जीवन एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था। चारों ने अलग-अलग परिस्थितियों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, लेकिन उद्देश्य एक ही रहा, धर्म की रक्षा और परिवार की एकता। इन बहनों ने यह सिद्ध किया कि नारी शक्ति केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि त्याग, सहनशीलता और प्रेम में भी प्रकट होती है। इनके जीवन प्रसंग रामायण को केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन बना देते हैं।

उपसंहार
मिथिला की इन चार बेटियों की गाथा आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उनके त्याग और धैर्य ने भारतीय संस्कृति को गहराई प्रदान की है। वे हमें यह सिखाती हैं कि सच्ची महानता दिखावे में नहीं, बल्कि मौन कर्म और निष्ठा में छिपी होती है। माता सीता के साथ उनकी तीनों बहनों का योगदान रामायण की कथा को पूर्णता देता है और उन्हें सदैव पूजनीय बनाता है।

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