Faith burns in the hills of Himachal: ज्वाला देवी मंदिर का अनसुलझा रहस्य
Faith burns in the hills of Himacha: हिमाचल प्रदेश अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और आध्यात्मिक स्थलों के लिए पूरे देश में जाना जाता है। इन्हीं पहाड़ियों के बीच स्थित है एक ऐसा मंदिर, जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने भीतर एक ऐसा रहस्य समेटे हुए है, जिसे आज तक पूरी तरह समझा नहीं जा सका। यह मंदिर है ज्वाला देवी मंदिर, जहां बिना मूर्ति के पूजा होती है और जहां धरती से निकलती अग्नि सदियों से लगातार जल रही है।

बिना मूर्ति का अनोखा मंदिर
भारत के अधिकतर मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं, लेकिन ज्वाला देवी मंदिर इस परंपरा से बिल्कुल अलग है। यहां किसी प्रतिमा की पूजा नहीं होती, बल्कि श्रद्धालु जमीन से निकलने वाली प्राकृतिक ज्वालाओं के दर्शन करते हैं। ये लपटें चट्टानों के बीच से स्वतः निकलती हैं और दिन-रात बिना रुके जलती रहती हैं। न बारिश इन्हें बुझा पाती है और न ही तेज हवाएं इन पर असर डालती हैं। यही विशेषता इस मंदिर को अत्यंत रहस्यमय और आकर्षक बनाती है।
ज्वाला देवी मंदिर का पौराणिक इतिहास
ज्वाला देवी मंदिर का इतिहास पौराणिक कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यह स्थान शक्तिपीठों में से एक है। कथा के अनुसार, जब देवी सती ने आत्मदाह किया और भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तब विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई भागों में विभाजित किया। कहा जाता है कि सती की जीभ इस स्थान पर गिरी थी। इसी कारण यहां शक्ति का वास माना जाता है और अग्नि को देवी का स्वरूप समझा जाता है।
पांडवों और मुगल काल से जुड़ी कथाएँ
ऐसी भी मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान कराया था। इसके अलावा मुगल सम्राट अकबर से जुड़ी कथा भी काफी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि अकबर ने इन ज्वालाओं को बुझाने का प्रयास किया, लेकिन वह असफल रहा। बाद में उन्होंने देवी के प्रति सम्मान स्वरूप मंदिर में सोने का छत्र चढ़ाया, जो रहस्यमय तरीके से किसी अन्य धातु में बदल गया। इस घटना के बाद अकबर की आस्था देवी में और गहरी हो गई।
ज्वाला देवी शक्तिपीठ का आध्यात्मिक महत्व
ज्वाला देवी मंदिर को शक्तिपीठ के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। यहां एक नहीं बल्कि नौ अलग-अलग ज्वालाएँ जलती हैं, जिन्हें नौ देवियों का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इन ज्वालाओं में देवी की शक्ति समाहित है और इनके दर्शन मात्र से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह स्थान विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो आध्यात्मिक शांति और आंतरिक ऊर्जा की खोज में रहते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और रहस्य
जहां भक्त इसे देवी की कृपा मानते हैं, वहीं वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक गैस का परिणाम बताते हैं। कई वर्षों तक वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में शोध किया और गहराई तक खुदाई भी करवाई, लेकिन गैस के स्पष्ट स्रोत का पता नहीं चल सका। यही कारण है कि यह स्थान आज भी विज्ञान और आस्था के बीच एक सेतु बना हुआ है।
आज के समय में ज्वाला देवी मंदिर का महत्व
आज ज्वाला देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यहां देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। नवरात्रि के समय मंदिर में विशेष आयोजन और मेले लगते हैं, जिससे स्थानीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है। यह मंदिर आस्था, परंपरा और रहस्य का जीवंत उदाहरण है।
ज्वाला देवी मंदिर कैसे पहुँचें
सड़क मार्ग से पहुँचने की जानकारी
ज्वाला देवी मंदिर कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी कस्बे में स्थित है। यह कांगड़ा से लगभग 30 किलोमीटर और धर्मशाला से करीब 56 किलोमीटर दूर है। सड़क मार्ग से टैक्सी और बस की सुविधा आसानी से उपलब्ध है।
रेल मार्ग से यात्रा
निकटतम रेलवे स्टेशन कांगड़ा है, जो मंदिर से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। स्टेशन से टैक्सी या स्थानीय बस द्वारा मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।
वायु मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए
गग्गल हवाई अड्डा, जो धर्मशाला के पास स्थित है, मंदिर के सबसे नजदीक है। यहां से टैक्सी या बस द्वारा ज्वाला देवी मंदिर तक पहुंचना सरल है।
ज्वाला देवी मंदिर जाने का उपयुक्त समय
मंदिर प्रतिदिन सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक खुला रहता है। साल के किसी भी समय यहां दर्शन किए जा सकते हैं, लेकिन नवरात्रि के दौरान यहां का वातावरण विशेष रूप से भक्तिमय हो जाता है। यदि आप भी हिमाचल प्रदेश की आध्यात्मिक यात्रा पर हैं, तो इस मंदिर के दर्शन अवश्य करें।

