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Ramayan: रावण को रात्रि में विचलित करने वाला वानर द्विविद और श्रीराम की नीति

Ramayan: रामायण का युद्ध केवल शस्त्रों और अस्त्रों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह मर्यादा, नीति और अनुशासन की भी एक महान परीक्षा थी। भगवान श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव के साथ मिलकर जिस वानर सेना का गठन किया था, वह केवल बलशाली योद्धाओं का समूह नहीं था, बल्कि उसमें विविध स्वभाव और प्रकृति के वानर भी सम्मिलित थे। कुछ वानर अत्यंत अनुशासित थे तो कुछ स्वभाव से ही उत्पाती और चंचल थे। इन्हीं उत्पाती वानरों में से एक था वानर द्विविद, जिसकी कथा रावण तक को श्रीराम की शरण में जाने को विवश कर देती है।

Ramayan
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वानर सेना का गठन और अनुशासन
भगवान श्रीराम द्वारा गठित वानर सेना उस काल की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक थी। इस सेना में अंगद, हनुमान, नल, नील जैसे पराक्रमी योद्धा थे। इतनी बड़ी और विविध सेना को नियंत्रित करने के लिए प्रत्येक गुट का एक प्रमुख नियुक्त किया गया था, जिसे यूथपति कहा जाता था। उस समय कपि नामक जाति के वानर प्रचलित थे, जो आज के युग में लुप्त हो चुके हैं। इन कपियों में असाधारण बल, वेग और साहस होता था, लेकिन उनके स्वभाव में उग्रता भी थी, जिसे संभालना सरल नहीं था।

द्विविद वानर का परिचय
द्विविद, जिसे कुछ ग्रंथों में द्वीत भी कहा गया है, वानरराज सुग्रीव के मंत्री मैन्द का छोटा भाई था। दोनों भाइयों में अपार शक्ति थी, कहा जाता है कि उनमें दस हजार हाथियों के समान बल था। द्विविद अत्यंत शक्तिशाली होने के साथ-साथ स्वभाव से भी अत्यधिक उत्पाती था। वह किष्किन्धा की एक गुफा में अपने भाई मैन्द के साथ निवास करता था। जब श्रीराम ने वानर सेना का गठन किया, तब उसकी असाधारण शक्ति को देखते हुए द्विविद को भी सेना में सम्मिलित कर लिया गया।

रात्रि में लंका प्रवेश की कथा
राम और रावण के बीच युद्ध के निश्चित नियम थे। दिन में युद्ध होता था और सूर्यास्त के बाद दोनों सेनाएं विश्राम करती थीं। किंतु द्विविद इन नियमों की परवाह नहीं करता था। वह रात्रि के समय चुपचाप लंका में प्रवेश कर जाता था। उस समय रावण प्रायः भगवान शिव की आराधना में लीन रहता था। द्विविद रावण की इस आराधना में जानबूझकर विघ्न डालता था, जिससे रावण का क्रोध और असहायता दोनों बढ़ने लगे।

रावण की श्रीराम से शिकायत
द्विविद के इस व्यवहार से रावण अत्यंत परेशान हो गया। दिन के युद्ध में वह श्रीराम की सेना से सामना करता था, लेकिन रात्रि में इस प्रकार की शरारतें उसे असहज कर रही थीं। अंततः रावण ने एक पत्र के माध्यम से स्वयं श्रीराम से शिकायत की। उसने लिखा कि युद्ध के नियमों के अनुसार सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं होता, फिर यह वानर रात्रि में लंका आकर उसकी शिव पूजा में बाधा क्यों डालता है। यह मर्यादा के विरुद्ध है और श्रीराम से अनुरोध किया कि वे अपने वानर को इस उत्पात से रोकें।

श्रीराम की प्रतिक्रिया और विवेक
रावण का पत्र पढ़कर श्रीराम ने तुरंत सुग्रीव से कहा कि पता लगाया जाए कि वह वानर कौन है। श्रीराम अंतर्यामी थे, इसलिए उन्होंने ध्यान लगाकर स्वयं भी इस विषय को जाना। उन्हें ज्ञात हुआ कि यह कार्य द्विविद कर रहा है। प्रभु श्रीराम ने द्विविद को बुलाया और उसे समझाया कि रात्रि में लंका जाकर उपद्रव करना उचित नहीं है। उन्होंने उसे युद्ध की मर्यादा और अनुशासन का महत्व बताया।

द्विविद की हठधर्मिता और निर्णय
हालांकि श्रीराम के समझाने के बाद भी द्विविद ने अपनी आदत नहीं बदली। उसका उग्र और उत्पाती स्वभाव उसे नियमों में बंधने नहीं दे रहा था। तब श्रीराम ने एक कठिन लेकिन न्यायसंगत निर्णय लिया। उन्होंने सुग्रीव से कहा कि द्विविद को अब युद्ध में सम्मिलित न किया जाए और उसे किष्किन्धा वापस भेज दिया जाए। यह निर्णय यह दर्शाता है कि श्रीराम के लिए विजय से अधिक महत्वपूर्ण धर्म और मर्यादा थी।

कथा से मिलने वाली सीख
द्विविद की यह कथा हमें यह सिखाती है कि केवल शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती, अनुशासन और मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक होती है। श्रीराम ने यह स्पष्ट कर दिया कि उनके पक्ष में होने के बावजूद यदि कोई नियमों का उल्लंघन करेगा, तो उसे दंड या दूरी दोनों का सामना करना पड़ेगा। यही कारण है कि श्रीराम आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजे जाते हैं।

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