Jaya Parvati Vrat: कन्याओं का मनचाहा वरदान और सुहागिनों की अटूट सौभाग्य कामना
Jaya Parvati Vrat: हिंदू धर्म में एक विशेष स्थान रखता है। यह व्रत मुख्य रूप से अविवाहित कन्याएं और विवाहित महिलाएं रखती हैं। कन्याएं इसे अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए करती हैं, जबकि सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु और घर में सुख-शांति बनाए रखने की कामना से। आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी से शुरू होकर पांच दिनों तक यह व्रत चलता है। इसकी पौराणिक कथा माता पार्वती की कृपा और भक्ति की शक्ति को दर्शाती है, जो हर भक्त के जीवन में खुशियां लाती है।

पौराणिक कथा की शुरुआत: ब्राह्मण दंपत्ति की संतानहीनता
प्राचीन समय में कौंडिल्य नगर में वामन नाम के एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी सत्या थी। दोनों का जीवन हर तरह से संपन्न था, लेकिन संतान न होने के कारण उनके मन में गहरा दुख था। वे हमेशा इस कमी को महसूस करते और भगवान से प्रार्थना करते रहते थे। एक दिन नारद मुनि उनके घर आए। ब्राह्मण दंपत्ति ने उनका बड़ा आदर-सत्कार किया और अपनी व्यथा सुनाई। नारद जी ने कहा कि नगर के बाहर दक्षिणी वन में बिल्व वृक्ष के नीचे शिव-पार्वती लिंग रूप में विराजमान हैं। उनकी नियमित पूजा से हर इच्छा पूरी हो सकती है।
शिवलिंग की खोज और नियमित पूजन
नारद जी की सलाह मानकर ब्राह्मण और उनकी पत्नी ने उस शिवलिंग को ढूंढ निकाला। दोनों ने पूरी श्रद्धा से रोजाना पूजा-अर्चना शुरू की। फूल चढ़ाना, धूप-दीप जलाना और मंत्रों का जाप करना उनका दैनिक क्रम बन गया। इस तरह पांच साल गुजर गए। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि वे कभी थके नहीं। लेकिन एक दिन जब ब्राह्मण जंगल में फूल तोड़ रहे थे, तभी एक विषैले सांप ने उन्हें डस लिया। वे वहीं गिर पड़े और बेहोश हो गए।
ब्राह्मणी का विलाप और माता पार्वती का प्रकट होना
जब ब्राह्मण देर तक घर नहीं लौटे, तो सत्या उन्हें ढूंढने जंगल पहुंची। पति को मृतप्राय हालत में देखकर वे फूट-फूटकर रोने लगीं। उन्होंने वन देवता और माता पार्वती को पुकारा। उनकी पुकार इतनी सच्ची थी कि माता पार्वती स्वयं वन देवता के साथ प्रकट हुईं। माता ने ब्राह्मण के मुख में अमृत डाल दिया, जिससे वे तुरंत जीवित हो उठे। दोनों ने माता पार्वती के चरणों में गिरकर धन्यवाद दिया और उनकी स्तुति की।
वरदान और विजया पार्वती व्रत की स्थापना
माता पार्वती ब्राह्मण दंपत्ति की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने कहा कि कोई वर मांगो। दोनों ने संतान प्राप्ति की कामना की। माता ने मुस्कुराते हुए कहा कि आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से यह विशेष व्रत शुरू करो। इस व्रत को करने से तुम्हारी इच्छा जरूर पूरी होगी। ब्राह्मण दंपत्ति ने ठीक वैसा ही किया। विधि-विधान से पांच दिनों तक व्रत रखा और पूजन किया। इसके फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई।
जया पार्वती व्रत का महत्व और लाभ
तब से इस व्रत को जया पार्वती व्रत कहा जाने लगा। ‘जया’ का अर्थ विजय होता है, जो माता पार्वती की कृपा से जीवन की हर बाधा पर जीत दिलाता है। यह व्रत संतान सुख के साथ-साथ अखंड सौभाग्य प्रदान करता है। सुहागिन महिलाएं इसे रखकर अपने वैवाहिक जीवन को मजबूत बनाती हैं। पति की दीर्घायु, घर में समृद्धि और पारिवारिक सुख की कामना पूरी होती है। वहीं कुंवारी लड़कियां मनवांछित पति प्राप्त करने के लिए इसे बड़ी श्रद्धा से करती हैं।
आज के समय में जया पार्वती व्रत की प्रासंगिकता
आधुनिक जीवन में भी यह व्रत महिलाओं के बीच लोकप्रिय है। गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत के कई हिस्सों में इसे बड़े उत्साह से मनाया जाता है। व्रत के दौरान महिलाएं निर्जला या फलाहार रहती हैं। शाम को माता पार्वती की कथा सुनना और पूजन करना अनिवार्य होता है। इस व्रत से न केवल व्यक्तिगत इच्छाएं पूरी होती हैं, बल्कि मन को शांति और आत्मविश्वास भी मिलता है। माता पार्वती की भक्ति जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की ताकत देती है।
व्रत से जुड़ी मान्यताएं और सावधानियां
मान्यता है कि इस व्रत को पूरी निष्ठा से करने पर माता पार्वती हर संकट से रक्षा करती हैं। व्रत के दिनों में क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखें। कथा सुनाते समय सभी परिवारजन एकत्र हों, इससे पुण्य कई गुना बढ़ता है। जो महिलाएं नियमित रूप से यह व्रत रखती हैं, उनके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
जया पार्वती व्रत सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्ति और विश्वास का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा से कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती। आज के व्यस्त जीवन में भी इस व्रत को अपनाकर महिलाएं अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकती हैं और परिवार को मजबूत बना सकती हैं।

