एक ऐसी सच्ची प्रेम कहानी जिसने करोड़ों बच्चों की ज़िंदगी सवारी

एक ऐसी सच्ची प्रेम कहानी जिसने करोड़ों बच्चों की ज़िंदगी सवारी

आज वेलेंटाइन डे (Valentine's Day) यानी प्रेम दिवस है। इस मौके पर एक से एक प्रेरणास्‍पद प्रेमकहानी याद आ रही है। ऐसी ही एक कहानी नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी (Kailash Satyarthi) व उनकी धर्मपत्‍नी श्रीमती सुमेधा कैलाश से भी जुड़ी है। यह हमारे रोम-रोम को पुलकित कर जाती है व एहसास कराती है कि काश सभी का प्रेम ऐसा ही होता। ऐसा प्रेम जो अपना सब कुछ सरेंडर कर परिवर्तन को जन्म देता है। एक ऐसा परिवर्तन जो संसार के करोंड़ों बच्चों की संसार बदल देता है।

दोनों की मुलाकात दिल्‍ली में होती है
70 के दशक की बात है। कैलाश सत्यार्थी अपने गृह नगर मध्य प्रदेश के विदिशा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। वह विद्यार्थी पॉलिटिक्स के साथ-साथ आर्य समाज से जुड़कर सामाजिक परिवर्तन में भी जुटे हुए थे। पढ़ाई के दौरान ही वह दिल्‍ली से निकलने वाली आर्य समाज की मशहूर पत्रिका 'जनज्ञान' में भी लिखा करते थे। व्‍यवस्‍था बदलाव में आर्य समाज की किरदार पर पत्रिका में लिखा उनका एक आर्टिक्ल बहुत ज्यादा चर्चित व विवादित हुआ था। इस बीच एक दिन वह दिल्ली आते हैं व पत्रिका के संपादक भारतेंद्रनाथ जी व उनकी प्रकाशक पत्‍नी पंडिता राकेशरानी से मिलने दफ्तर चले आते हैं, लेकिन कार्यालय में उनकी मुलाकात सुमेधा नाम की एक बेहद सुंदर लड़की से होती है, जो उस समय पत्रिका की सह-संपादिका थीं।

'जनज्ञान' नाम की एक पत्रिका दफ्तर में उनकी मुलाकात सुमेधा नाम की एक बेहद सुंदर लड़की से होती है।

लेखक की व्यापक चर्चा की वजह से सुमेधा जी कैलाश सत्‍यार्थी के नाम से अवगत होते हुए भी उन्‍हें पहचानने से इंकार कर देती हैं, क्‍योंकि वह यह मानकर बैठी हुई थीं कि कैलाश सत्‍यार्थी नाम का व्‍यक्ति कोई 50-60 वर्ष का परिपक्‍व व दार्शनिक आदमी होगा। उन्‍हें 20-21 वर्ष के छैल-छबीले रणबांकुरे में कैलाश सत्‍यार्थी में वह नहीं दिखा। सुमेधा जी सहित कार्यालय की सारी लड़कियां यह कह कर हंस पड़ीं, 'चले हैं महाशय, कैलाश सत्‍यार्थी बनने। ' हालांकि संपादक भारतेंद्रनाथ ने ज्ञानवर्धक वार्ता में जान लिया कि यह नौजवान ही वास्तविक कैलाश सत्यार्थी है। वह रात को उन्हें अपने घर ले जाते हैं। सत्यार्थी जी को ऐसे देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। घर के सभी सदस्‍यों से वार्ता होती है लेकिन सुमेधा जी व कैलाश जी का एक दूसरे के प्रति बर्ताव संकोच भरा ही रहता है। प्रातः काल में सुमेधा जी चाय बनाकर लाई, लेकिन यह पूछना नहीं भूलती हैं कि 'चाय में कितनी चीनी डालूं?' कैलाश जी का जवाब होता है, 'आप चाहे जितनी डाल दें, या न भी डालें, चाय तो मीठी हो ही जाएगी। ' सुमेधा जी शरमा जाती हैं व मुस्‍कुराती हुई लौटती हैं।

जब सुमेधा जी पूछतीं, 'चाय में कितनी चीनी डालूं?' कैलाश जी का जवाब होता, 'चाहे जितनी डाल दें, या न डालें, चाय मीठी हो ही जाएगी। '

यहीं से कैलाश जी व सुमेधा जी की प्रेम कहानी प्रारम्भ हो चुकी होती है। कैलाश जी को इसका सुखद एहसास विदिशा लौटने पर होता है, जो दिल्‍ली से सैकड़ों मील की दूरी पर है। समीप में रहकर प्रेम को हम उतना नहीं जान पाते, जितना दूर रहकर जान लेते हैं। कैलाश जी की वे स्‍मृतियां ताजा होने लगती हैं, जिनमें वे 'जनज्ञान' में छपी सुमेधा जी की तस्‍वीर को देखकर सोचने लगते थे कि इस लड़की में कोई खास बात है, जो औरों में नहीं है। कैलाश जी व सुमेधा जी दोनों उस पहली मुलाकात में ही एक दूसरे को पसंद करने लगे थे, लेकिन अपने-अपने संस्‍कारों या सामाजिक वर्जनाओं, बंदिशों की वजह से प्रेम का इजहार नहीं कर पाए थे। वक्‍त कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। एक वर्ष के दौरान दोनों में न तो कोई चिट्ठी-पत्री हुई थी व न ही कोई संवाद। हां, मथुरा में एक मुलाकात दोनों के बीच जरूर हुई थी। तभी दोनों ने अकेले में घूमने-फिरने का मौका ढूंढ़ लिया था। कैलाश जी के बालसखा ओमप्रकाश जी दोनों के बीच मध्‍यस्‍थ की किरदार निभाने का कार्य कर रहे थे। दोनों की प्रेम चर्चा सुमेधा जी के परिवार में होने लगती है। नौजवान कैलाश जी की शख्सियत से भारतेंद्रनाथ जी पहले ही प्रभावित थे।

कैलाश जी सुमेधा जी की तस्‍वीर देखकर सोचने लगते थे कि इस लड़की में कोई खास बात है, जो औरों में नहीं है।

प्रेम की डोर से विवाह के बंधन तक
सुमेधा जी के माता-पिता दोनों की विवाह के सिलसिले में कैलाश जी के घर विदिशा पहुंचते हैं। विदिशा में अपने प्रगतिशील विचारों व परिवर्तन की मुहिम की वजह से समाज के पुरातनपंथी लोग कैलाश सत्यार्थी को पंसद नहीं करते थे। उनकी इस छवि को निर्मित करने में दलितों के हाथ का बना खाना विशेष रूप से शामिल हो गया था। इस वजह से उन्हें जाति बाहर भी कर दिया गया था। ब्राहमणों के धर्मादेश को भी उन्‍होंने नहीं माना था। कॉलेज में विद्यार्थी पॉलिटिक्स करते हुए उन्‍होंने खुलकर छात्राओं के अधिकारों व गरिमा की बात की थी। कैलाश जी की इस छवि ने परंपरावादियों को आपे से बाहर कर दिया था। दलितों के साथ भोजन, उनके घर यज्ञ आयोजन, हिंदी आंदोलन, सरकारी लाल बत्ती गाड़ियों के दुरुपयोग व शहर की सफाई के लिए कूड़ा यज्ञ आदि की वजह से शहरवासियों में वह लोकप्रिय हो चुके थे व उनकी छवि युवा विद्रोही की बन चुकी थी।

प्रगतिशील विचारों व परिवर्तन की मुहिम की वजह से समाज के पुरातनपंथी लोग कैलाश सत्यार्थी को पंसद नहीं करते थे।

भारतेंद्रनाथ जी विदिशा में जिनके यहां ठहरे थे। वह कैलाश जी के घनघोर विरोधी थे। जब यह सूचना शहर के पुरातनपंथियों को मिली कि मशहूर आर्यसमाजी भारतेंद्रनाथ जी व उनकी पत्‍नी अपनी सुपुत्री की विवाह कैलाश सत्‍यार्थी से तय करने के सिलसिले में शहर आए हुए हैं, तो उन लोगों ने षड्यंत्र रचा कि किसी भी मूल्य पर यह विवाह नहीं होने देनी है। उन लोगों ने सुमेधा जी के माता-पिता से मिलकर कैलाश जी की मुखालफत करनी प्रारम्भ कर दी। यहां तक कि उन लोगों ने कैलाश सत्‍यार्थी को एक आवारा व गुंडा लड़का बताते हुए बोला कि सुमेधा यदि उनकी बहन या बेटी होतीं, तो वे किसी भी मूल्य पर कैलाश सत्‍यार्थी से विवाह करके उनके भविष्‍य को दांव पर नहीं लगाते।

लाख दुश्‍वारियों के बावजूद कैलाश जी व सुमेधा जी का प्‍यार बेपनाह, बेइंतिहा व बेहिसाब बढ़ता गया।

सुमेधा जी के माता-पिता इन झूठी बातों के बहकावे में आ गए व उन्‍होंने विवाह के अपने प्रस्‍ताव से इंकार कर दिया, लेकिन सुमेधा जी अड़ी रहीं कि वह विवाह तो कैलाश से ही करेंगी। दोनों की प्रेम की नैया जैसे-जैसे विवाह की तरफ बढ़ती वह उसी हिसाब से हिचकोले भी खाती जाती। बात बन-बनकर बिगड़ जाती। आंधी-तूफान के सैलाब उमड़ पड़ते, लेकिन तूफान को भी पता नहीं था कि वह जिस सागर में आ रहा है, उसकी गहराई कितनी है। आंधी को भी पता नहीं था कि वह जिस आसमान पर अपने को उड़ाना चाहती है, उसकी ऊंचाई कितनी है। ऐसे में कैलाश जी व सुमेधा जी का प्‍यार बेपनाह, बेइंतिहा व बेहिसाब बढ़ता गया।

दोनों की प्रेम की नैया जैसे-जैसे विवाह की तरफ बढ़ती वह उसी हिसाब से हिचकोले खाती। बात बन कर बिगड़ जाती।

कैलाश सत्यार्थी ने एक दिन सुमेधा जी को 04 पृष्‍ठों का एक प्रेम लेटर लिखा। इसमें उन्‍होंने विस्‍तार से अपने ज़िंदगी के लक्ष्‍यों व उद्देश्‍यों के बारे में बताया। उन्‍होंने लिखा, 'आत्‍मनियंत्रण व संयम मेरी सुमेधा में इतना होना चाहिए कि लोग ईर्ष्‍या करने लगें। हम जैसे लोग जो संपूर्ण सामाजिक व्‍यवस्‍था व ढांचे में परिवर्तन के लिए संकल्‍पबद्ध हैं, जिनका ज़िंदगी निज की सीमाएं तोड़कर 'पर' की असीमितता से जुड़ा हो, उन्‍हें उल्टा व जोखिम भरी परिस्थितियों में भी संतुलित व संयमित रहने का स्‍वभाव बनाना चाहिए। ' कैलाश जी ने अपने ज़िंदगी के उद्देश्य को इंगित करती हुई एक कविता भी इसी लेटर के माध्यम से सुमेधा जी को भेजी।

उजली इमारत के लाख दीये बेमानी,
चलो बनें एक दीया अंधियारी बस्ती का
बाहर के साथ-साथ अंतस् का तम मिटे
फर्क मिटे बूंद व सागर की शख़्सियत का

 आखिरकार वह दिन आया, जिसका दोनों को बेसब्री से इंतजार था। सुमेधा जी ने कैलाश जी को फोन कियाकि घर के लोगों ने इसी रविवार को विवाह का दिन तय कर दिया है। पिताजी ने गुस्से में कह दिया है कि अगर उस दिन हमारी विवाह नहीं होती है, तब फिर मेरी विवाह किसी व लड़के से कर दी जाएगी। इसलिए आप बरात लेकर फौरन दिल्‍ली चले आइए। कैलाश जी के अस्तित्‍व के लिए यह सवाल था। उन्‍होंने भी जैसे-तैसे अपने परिवार को मनाया व कुछ मित्रों व परिवार के सदस्‍यों को लेकर विवाह के लिए दिल्‍ली पहुंच गए। 08 अक्‍टूबर, 1977 की शाम को बड़ी सादगी से कैलाश जी व सुमेधा जी दाम्‍पत्‍य सूत्र में बंध गए।

कैलाश सत्यार्थी ने एक दिन सुमेधा जी को 04 पृष्‍ठों का एक प्रेम लेटर लिखा। इसमें उन्‍होंने विस्‍तार से अपने ज़िंदगी के लक्ष्‍यों व उद्देश्‍यों के बारे में बताया।