भारत-चीन के बीच कूटनीतिक संबंध के 70 वर्ष पूरे

भारत-चीन के बीच कूटनीतिक संबंध के 70 वर्ष पूरे

एक अप्रैल को हिंदुस्तान व चाइना के बीच स्थापित राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष सारे हो गए हैं. बीते वर्षों में भारत-चीन संबंधों में कुछ छोटी टकरावों के बावजूद रिश्तों में प्रगाढ़ता देखी गई है. दोनों ही देश एक असाधारण विकास पथ से होकर गुजरे हैं.

1950 के दशक में दोनों राष्ट्रों ने आपस में राजनयिक संबंध स्थापित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया व संयुक्त रूप से 'शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धान्तों' की वकालत की. दोनों ही देश शांति व मैत्रीपूर्ण परामर्श के माध्यम से सीमा टकराव को सरलता से हल करने व द्विपक्षीय संबंधों को विकसित करने के पक्षधर रहे हैं. दोनों राष्ट्रों के बीच संबंधों व पृष्ठभूमि के घटनाक्रम

  • एक अप्रैल 1950 को भारत-चीन के बीच राजनयिक संबंध स्थापित हुए, हिंदुस्तान चाइना के साथ संबंध बनाने वाला पहले गैर समाजवादी देश था. उस समय हिंदी चीनी भाई भाई एक तकिया कलाम बन गया.
  • 1954 में चीनी पीएम का हिंदुस्तान दौरा. भारत-चीन ने संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर किए व शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों की वकालत की.
  • 1954 में भारतीय पीएम ने चाइना का दौरा किया. चाइना के जनवादी गणराज्य की स्थापना के बाद नेहरू चाइना का दौरा करने वाले पहले गैर-समाजवादी देश की सरकार के प्रमुख थे.
  • 1955 में प्रीमियर झोउ एनलाई व पीएम नेहरू सहित 29 राष्ट्रों ने एशियाई-अफ्रीकी सम्मेलन बांडुंग, इंडोनेशिया में भाग लिया, साथ ही एकजुटता, मित्रता व योगदान के भावना की वकालत की. 
  • 1962 में सीमा प्रयत्न से द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर झटका लगा व बाद में 1976 को दोनों राज्यों के संबंध दोबारा बहाल किए गए. इसके बाद द्विपक्षीय संबंधों में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिला.
  • 1988 में पीएम राजीव गांधी ने चाइना का दौरा किया जिसके बाद दोनों देश सीमा टकराव का निवारण व दूसरे क्षेत्रों में सक्रिय रूप से द्विपक्षीय संबंधों को विकसित करने के लिये सहमत हुए. 
  • 1992 में भारतीय राष्ट्रपति आर। वेंकटरमन हिंदुस्तान गणराज्य की स्वतंत्रता के बाद से चाइना का दौरा करने वाले पहले भारतीय राष्ट्रपति बने.
  • 2003 में पीएम वाजपेयी ने चाइना का दौरा किया व दोनों पक्षों ने भारत-चीन संबंधों में सिद्धांतों व व्यापक योगदान की घोषणा पर हस्ताक्षर किए.
  • 2008 में पीएम डाक्टर मनमोहन सिंह ने चाइना का दौरा किया व दोनों सरकारों ने '21वीं सदी के लिये एक साझा विज़न' पर एक सहमति जाहीर की.
  • 2011 को 'चीन-भारत विनिमय वर्ष' व वर्ष 2012 को 'चीन-भारत मैत्री व योगदान का वर्ष' के रूप में मनाया गया. 
  • 2015 में पीएम मोदी ने चाइना का दौरा किया जिसके बाद चाइना ने भारतीय आधिकारिक तीर्थयात्रियों के लिये नाथू ला दर्रा खोलने का निर्णय किया. 
  • 2018 में चाइना के राष्ट्रपति व भारतीय पीएम के बीच वुहान में ‘भारत-चीन अनौपचारिक शिखर सम्मेलन’ का आयोजन हुआ. 
  • दोनों राज्यों के बीच गहन विचार-विमर्श, वैश्विक व द्विपक्षीय रणनीतिक मुद्दों के साथ-साथ घरेलू व विदेशी नीतियों के लिये उनके संबंधित दृष्टिकोणों पर व्यापक सहमति बनी. 
  • 2019 में पीएम व चाइना के राष्ट्रपति बीच चेन्नई में ‘दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन’ आयोजित हुआ इसमें पहली मीटिंग में बनी आम सहमति को व अधिक दृढ़ किया गया.

भारत व चाइना के शीर्ष नेताओं की ओर से दो अनौपचारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किए गए. इसी के साथ वैश्विक व क्षेत्रीय महत्त्व के मुद्दों पर गहन विचारों का आदान-प्रदान भी किया गया. हिंदुस्तान व चाइना के बीच द्विपक्षीय, क्षेत्रीय व वैश्विक चिंताओं के भिन्न भिन्न विषयों पर विचारों को रखने के लिए संवाद के करीब 50 माध्यम हैं.

दोनों राष्ट्रों के बीच उच्च स्तरीय यात्राओं का आयोजन, अंतर-संसदीय मैत्री समूह की स्थापना व सीमा के टकराव के निपटाने के लिए विशेष प्रतिनिधियों की मीटिंग आदि का आयोजन समय-समय पर किया जाता रहा है.

भारत-चीन के बीच विज्ञान व प्रौद्योगिकी 
भारतीय कंपनियों ने चाइना में तीन सूचना प्रौद्योगिकी कॉरिडोर बनाए हैं, जो सूचना प्रौद्योगिकी व उच्च प्रौद्योगिकी में भारत-चीन योगदान को बढ़ावा देने में मदद करते हैं.

भारत-चीन के बीच रक्षा क्षेत्र
हिंदुस्तान व चाइना के बीच हैंड-इन-हैंड संयुक्त आतंकवाद-रोधी एक्सरसाइज के अबतक आठ दौर आयोजित किये जा चुके हैं.

दोनों देश स्थायी व उच्च गुणवत्ता वाली आर्थिक विकास को बढ़ावा देने पर जोर देते आए हैं. इसी के साथ वैश्विक बहूपक्षीय व्यापार की सुरक्षा करने, वैश्विक शासन प्रणाली में सुधार व अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व वित्तीय जोखिमों से सुरक्षा करने की दिशा में कार्य कर रहे हैँ.

21वीं सदी की आरंभ से लेकर अबतक हिंदुस्तान व चाइना के बीच होने वाला व्यापार 3 बिलियन डॉलर से बढ़कर लगभग 100 बिलियन डॉलर (32 गुना) हो गया है. 2019 में हिंदुस्तान व चाइना के बीच होने वाला व्यापार 92.68 बिलियन डॉलर था.

हिंदुस्तान में औद्योगिक पार्कों, ई-कॉमर्स व दूसरे क्षेत्रों में एक हजार से ज्यादा चाइना की कंपनियों ने निवेश किया है. ये कंपनियां चाइना के मार्केट में सक्रिय रूप से विस्तार कर रही हैं व चाइना में निवेश करने वाली दो-तिहाई से ज्यादा भारतीय कंपनियां लगातार मुनाफा कमा रही हैं.

2.7 बिलियन से ज्यादा लोगों के संयुक्त मार्केट व संसार के 20 फीसद सकल घरेलू उत्पाद के साथ, हिंदुस्तान व चाइना के लिये आर्थिक व व्यापारिक योगदान में व्यापक संभावनाएं हैं. हिंदुस्तान में चाइना की कंपनियों का संचयी निवेश 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर से भी ज्यादा है.

दोनों राष्ट्रों ने कला, प्रकाशन, मीडिया, फिल्म व टेलीविजन, संग्रहालय, खेल, युवा, पर्यटन, स्थानीयता, पारंपरिक चिकित्सा, योग, एजुकेशन व थिंक टैंक के क्षेत्र में आदान-प्रदान व योगदान पर बेहद प्रगति की है.

दोनों राष्ट्रों ने सिस्टर नगरों व प्रांतों के 14 जोड़े बनाए हैं. फ़ुज़ियान प्रांत व तमिलनाडु को सिस्टर प्रांतों के रूप में जबकि चिनझोऊ व चेन्नई को सिस्टर नगरों के रूप में विकसित किया जाएगा. इसके अतिरिक्त भाषा सीखना हिंदुस्तान में एक लोकप्रिय रूचि बनकर उभर रही है इसलिए दोनों राष्ट्रों के भाषा संस्थानों के मध्य लगातार योगदान बढ़ रहा है.

भारत-चीन के अंतर्निहित विवादित मुद्दे
दोनों राष्ट्रों के बीच मैत्री संबंध होने के बावजूद भी कुछ सीमा व क्षेत्रीय टकराव भी हैं जिनमें पोंगोंग त्सो मोरीरी झील टकराव 2019, डोकलाम गतिरोध 2017, अरुणाचल प्रदेश में आसफिला क्षेत्र पर टकराव शामिल हैं.

परमाणु आपूर्तिकर्त्ता समूह में हिंदुस्तान का प्रवेश, संयुक्त देश सुरक्षा परिषद में हिंदुस्तान की स्थायी सदस्यता आदि पर चाइना का प्रतिकूल रुख भी विवादित मुद्दों की श्रेणी में आते हैं. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे टकराव भी एक अंतर्निहित मामला है. इसके अतिरिक्त सीमा पार आतंकवाद के मामले पर चाइना का पाक को समर्थन व चाइना का हिंद-प्रशांत महसागरीय क्षेत्र में हिंदुस्तान की किरदार पर भी असंतोष जाहिर करना.

दोनो राष्ट्रों के बीच विवादों को निपटाने के लिए नीचे लिख गए कदमों का सहारा लिया जा सकता है

  • नेताओं के रणनीतिक मार्गदर्शन का पालन करना 
  • मैत्रीपूर्ण योगदान की सामान्य प्रवृत्ति को समझना 
  • पारस्परिक रूप से फायदेमंद योगदान की गति का विस्तार करना 
  • अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय मामलों पर समन्वय को बढ़ाना
  • आपसी मतभेदों का उचित प्रबंधन करना