भाई की सुख-समृद्धि के लिए आज करमा एकादशी का व्रत रखेंगी बहनें

भाई की सुख-समृद्धि के लिए आज करमा एकादशी का व्रत रखेंगी बहनें

शुक्रवार को ही पद्मा एकादशी है। बिहार झारखंड में इसे ही करमा एकादशी के नाम से जाना जाता है। बहन अपने भाइयों के लिए इस व्रत को करती हैं। रात्रि में झुर की पूजा करती हैं। करमी और बेलोधर के पत्तों का विशेष रूप से प्रयोग करती हैं। आचार्य लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि शनिवार प्रात: 5.56 बजे से पहले पारण कर लेना चाहिए। प्रथम झुर में दही भात दाल करमी के पत्ता डालना चाहिए। झुर को विसर्जन करने के बाद घर में नली इत्यादि में दही भात डालने के बाद स्वयं करमी के पत्ता के साथ दही भात बासी भोजन करने की परंपरा है। इस दिन भोजन नहीं बनाया जाता है।

यह जानना है आवश्यक

जो केवल एकादशी व्रत करते हैं। वे मध्याह्न 12 बजे के बाद 18 सितंबर दिन शनिवार के रोटी इत्यादि से पारण करें। क्योंकि इस दिन वामन अवतार हुआ है। इसलिए इसे वामन द्वादशी भी कहा जाता है। एकादशी के पहले और दूसरे दिन भात नहीं भोजन करना चाहिए।


विश्वकर्मा पूजा आज : व्यवसाय से जुड़ा है धार्मिक महत्व

संवाद सहयोगी, दाउदनगर (औरंगाबाद)। शुक्रवार यानि 17 सितंबर को धूमधाम से विश्वकर्मा भगवान की पूजा अर्चना की जाएगी। किसी भी तरह के वाहन रखने वाले, किसी भी प्रकार के मशीनरी रखने, बिक्री करने वाले, सामग्री निर्माण से जुड़े उपकरण रखने वाले विश्वकर्मा पूजा करते हैं। यह व्यवसाय से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान है। आचार्य लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि विश्वकर्मा वैदिक देवता हैं। इनकी चर्चा चारों वेद में है। यज्ञ में मण्डप पूजा, कुंड पूजा एवं अरणी मंथन के समय अग्नि निकलने से पहले पूजा की जाती है। यमलोक, स्वर्गलोक, लंका, द्वारिकापुरी, सुदामा पूरी का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने किया है।

 
बताया कि कहा जाता है कि विश्वकर्मा जी के पुत्र मय ने राजा युधिष्ठिर की यज्ञ शाला का निर्माण किया था। मगध में प्रचलित कहावत है कि भगवान विश्वकर्मा जी ने एक ही रात में देव, देवकुंड और भरारी में मन्दिर निर्माण किया था। परंतु भरारी में मन्दिर निर्माण प्रारम्भ करते ही सबेरा हो गया था। अत: मंदारेश्वर महादेव का मंदिर नहीं बन सका। ऐसे भी कहा जाता है कि देव सूर्य कुंड का जल कांवर में लेकर प्रथम उमगा में और वहां से चलकर देवकुंड में जल एक ही दिन में चढ़ाने की पूर्व परंपरा मगध की थी। जो लुप्त हो गई। बताया कि विश्वकर्मा जी की पूजा अर्चना पहले केवल बड़ी बड़ी कम्पनियों में होती थी। परन्तु आज घर घर होने लगी है।


आज है अखंड सौभाग्य का पर्व करवा चौथ, जानिए पूजा विधि और चंद्र अर्घ्य का मंत्र

आज है अखंड सौभाग्य का पर्व करवा चौथ, जानिए पूजा विधि और चंद्र अर्घ्य का मंत्र

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। हिंदू धर्म में करवा चौथ के व्रत का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं अखण्ड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की प्राप्ति के लिए करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। करवा चौथ के दिन सुहागिन और विवाह योग्य लड़कियां सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जल व्रत रखती हैं। व्रत का पारण करवा माता और गौरी गणेश के पूजन के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर किया जाता है। इस साल करवा चौथ का व्रत 24 अक्टूबर, रविवार के दिन रखा जाएगा। आइए जानते हैं वाराणसी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट के अनुसार करवा चौथ की व्रत और पूजन विधि और मंत्रों के बारे में.....

करवा चौथ व्रत की पूजन विधि

इस साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 23 अक्टूबर को रात्रि 12 बजकर 42 मिनट से शुरू होकर, 24 अक्टूबर को रात्रि 2 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। इसलिए करवा चौथ का व्रत 24 अक्टूबर, दिन रविवार को ही रखा जाएगा। इस दिन महिलाओं को सुबह सूर्योदय के काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। दिन भर चंद्रोदय काल तक निर्जल व्रत करना चाहिए। करवा चौथ का पूजन चंद्रोदय के बाद किया जाता है। सबसे पहले गौरी-गणेश का पूजन किया जाता है, इसके बाद करवा माता या सौभाग्य दायिनी ललिता देवी का पूजन किया जाता है।

जल,धूप-दीप,नैवेद्य,रोली,अक्षत,पुष्प,दूब एवं पंचामृत से विधिवत गौरी-गणेश का पूजन कर हलवा-पूड़ी का भोग लगाना चाहिए। करवा माता को श्रृंगार का सामान और लाल चुनरी चढ़ाई जाती है। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करके, करवा माता की आरती करनी चाहिए। व्रत का पारण चंद्रमा को अर्घ्य देकर किया जाता है। चंद्रमा को जल,दूध,सफेद चन्दन,सफेद फूल,इत्र एवं मिश्री डालकर, पान,खड़ी सुपारी तथा अपने केश का एक कोना पकड़ कर अर्घ्य देना चाहिए। चलनी से चंद्रमा का दर्शन करने के बाद पति के हाथ से जल ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है।

करवा चौथ पूजन के मंत्र

गणेश जी के मंत्र -

गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।

उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

गौरी मां का मंत्र -

देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परम् सुखम्।सन्तान देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ।।

चन्द्र अर्घ्य का मत्रं -

एहि चन्द्र सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते ।

अनुकम्प्यम माम देव ग्रहाण अर्घ्यम सुधाकर:।।

सुधाकर नमस्तुभ्यम निशाकर नमोस्तुते।।

क्षमा प्रार्थना और फल प्राप्ति का मंत्र -

यद्क्षर पदभृष्टम मात्राहीनम च यद् भवेत सर्वम क्षम्यताम देवि त्राहिमाम शर्णागतम।। गतं दुखं गतं पापं गतं दारिद्र्यमेव च, आगतां सुख सम्पत्तिम सौभाग्यं देहि मे शिवे।।

अन्त में हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपने व्रत-पूजन को करवा माता के चरणों में समर्पित करनी चाहिए ।