आरबीआई के एक सुझाव से इस बैंक ने मचाई शेयर मार्केट में धूम

आरबीआई के एक सुझाव से इस बैंक ने मचाई शेयर मार्केट में धूम

नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गठित एक समूह ने बैंकिंग नियमन कानून में महत्वपूर्ण संशोधन के बाद बड़ी कंपनियों को बैंकों का प्रवर्तक बनने की अनुमति देने का और मौजूदा समय में प्राइवेट में प्रमोटर्स की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रस्ताव के बाद आईडीएफसी लिमिटेड और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक लिमिटेड के शेयरों में जबरदस्त तेजी देखने को मिल रही है. जहां आईडीएसफी लिमिटेड के शेयरों में 11 वर्ष के बाद इंट्रा में सबसे बड़ी तेजी आई है. वहीं बैंक के शेयर 8 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है.

आईडीएफसी लिमिटेड के शेयर में 20 प्रतिशत का अपर सर्किट
आईडीएफसी के शेयर में आज 20 प्रतिशत का अपर सर्किट देखने को मिला है. इंट्रा डे में आईडीएफसी की यह मई 2009 के बाद सबसे बड़ी तेजी है. वहीं कंपनी का शेयर भी 10 महीने के उच्च स्तर पर है. आंकड़ों के मुताबिक बीएसई पर आईडीएफसी लिमिटेड का शेयर 6.65 रुपए यानी 19.88 प्रतिशत की तेजी के साथ 40.10 रुपए पर कारोबार कर रहा है. जबकि आज कंपनी का शेयर 37.70 रुपए पर खुला था. शुक्रवार को कंपनी का शेयर 33.45 रुपए पर बंद हुआ था. कंपनी के शेयर की 52 हफ्तों की उंचाई 40.50 रुपए है. यानी अपना रिकॉर्ड तोडऩे में कंपनी केवल 40 पैसे से पीछे रह गए.

आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के शेयरों में 10 प्रतिशत की तेजी
वहीं दूसरी ओर आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के शेयरों में 10 प्रतिशत से अधिक की तेजी देखने को मिल रही है. 10 प्रतिशत से अधिक की तेजी के साथ दिन के 37.75 रुपए के साथ उपरी स्तर पर गया. जबकि आज कंपनी का शेयर 34.45 रुपए पर खुला था. आपकी जानकारी के लिए बताते चलें कि शुक्रवार को बैैंक का शेयर 33.55 रुपए पर बंद हुआ था. वहीं मौजूदा समय में कंपनी का शेयर 36.60 रुपए पर कारोबार कर रहा है. इस तेजी के बाद बैंक का शेयर 8 महीने के उच्चतम स्तर पर कारोबार कर रहा है.

रिजर्व बैंक की समिति के सुझाव
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा गठित एक समूह ने बैंकिंग नियमन कानून में महत्वपूर्ण संशोधन के बाद बड़ी कंपनियों को बैंकों का प्रवर्तक बनने की अनुमति देने का प्रस्ताव किया है. साथ ही निजी क्षेत्र के बैंकों में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी की सीमा बढ़ाकर 26 फीसदी किये जाने की सिफारिश की है. समूह ने बड़ी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को बैंकों में परिवर्तित करने का भी प्रस्ताव दिया है.


नई शिक्षा नीति पर अमल को सरकार दे सकती है अलग से फंड, शिक्षा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को दिया है प्रस्ताव

नई शिक्षा नीति पर अमल को सरकार दे सकती है अलग से फंड, शिक्षा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को दिया है प्रस्ताव

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अमल को लेकर सरकार जिस तरह से पूरी ताकत से जुटी है, उससे साफ है कि इसे आगे बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से बजट में अलग से वित्तीय प्रविधान किए जा सकते हैं। शिक्षा मंत्रालय ने इसे लेकर वित्त मंत्रालय को एक प्रजेंटेशन भी दिया है। इसमें नीति के अमल से जुड़ी जरूरतों को प्रमुखता से रखा गया है। वैसे भी देश की आजादी के 75वें साल यानी वर्ष 2022 में जिस तरह स्कूली बच्चों को नई नीति के तहत किताबें मुहैया कराने जैसे लक्ष्य रखे गए हैं, उसमें ज्यादा जरूरत पैसों की होगी।

खास बात यह है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी सरकार से शिक्षा पर खर्च को दोगुना करने की सिफारिश की गई है। नीति में साफ कहा गया है कि शिक्षा को नई ऊंचाई देने और नीति के अमल के लिए जरूरी है कि शिक्षा पर कुल सरकारी खर्च का बीस फीसद राशि खर्च की जाए। जो मौजूदा समय में कुल सरकारी खर्च का सिर्फ दस फीसद ही है।

मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों की मानें, तो नीति में भले ही शिक्षा पर खर्च में दोगुनी बढ़ोतरी की सिफारिश की गई है, लेकिन यह मौजूदा परिस्थितियों में एक साथ करना संभव नहीं है। यह जरूर है कि यह बढ़ोतरी आने वाले सालों में एक क्रमबद्ध तरीके से की जा सकती है। इसकी शुरुआत सरकार की ओर से इसी साल से की जा सकती है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अमल को लेकर वैसे तो शिक्षा मंत्रालय ने दो क्षेत्रों को चिन्हित किया है। इनमें एक क्षेत्र ऐसा है, जिनमें उन सारी गतिविधियों को शामिल किया गया है, जिनके अमल के लिए पैसों की कोई जरूरत नहीं होगी। बल्कि इन्हें मंत्रालय के स्तर पर प्रशासनिक तरीके से अंजाम दिया जाना है। जबकि दूसरे क्षेत्र में ऐसी गतिविधियों को रखा है, जिसके लिए पैसों की जरूरत होगी।


फिलहाल इनमें जो अमल है, उनमें स्कूली बच्चों को खाने के साथ नाश्ता भी देना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, स्कूली शिक्षा में प्री-स्कूल को शामिल करना, शिक्षकों के खाली पदों को भरना, शोध को बढ़ावा देना, उच्च शिक्षण संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने सहित ऑनलाइन शिक्षा को मजबूती देने जैसे कदम शामिल हैं।

सरकार इस बार शिक्षा नीति के अमल को लेकर कुछ सतर्क भी है, क्योंकि इससे पहले जो नीति बनाई गई, उस पर पैसों के अभाव में ठीक से अमल नहीं हो सका था। हरेक नीति में शिक्षा पर जीडीपी का छह फीसद तक खर्च करने की सिफारिश की गई, लेकिन अभी भी शिक्षा पर जीडीपी के चार फीसद के आसपास खर्च किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में शिक्षा का कुल बजट करीब एक लाख करोड़ रुपये था।


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