एपल फोन बनाने वाली फॉक्सकॉन समेत देसी-विदेशी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ीं, मशीनें खड़ी करने के लिए चीनी इंजीनियर्स का इंतजार

एपल फोन बनाने वाली फॉक्सकॉन समेत देसी-विदेशी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ीं, मशीनें खड़ी करने के लिए चीनी इंजीनियर्स का इंतजार

कई कंपनियां अब चीन में काम नहीं करना चाहतीं। वे वहां से अपना सारा सेटअप बाहर लेकर जा रही हैं। इनमें से ज्यादातर ने प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम की वजह से भारत का रुख किया है। कई तो अपनी बड़ी-बड़ी मशीनों के साथ पिछले साल यहां आ चुकी हैं। अब उनके सामने मशीनों के सेटअप की समस्या खड़ी हो गई है। एपल के प्रोडक्ट बनाने वाली फॉक्सकॉन और विस्ट्रॉन के साथ सैमसंग भी ऐसी ही समस्या से जूझ रही हैं। लोकल कंपनी लावा, माइक्रोमैक्स का हाल भी ऐसा ही है।

दरअसल, चीन में इन कंपनियों की मशीनों को वहां के इंजीनियर्स और टेक्नीशियन से सेट किया था। यहां पर इस काम को उनके बिना नहीं किया जा सकता। पिछले साल यहां आ चुकी कंपनियां भी अब तक काम शुरू नहीं कर पाई हैं। ऐसे में इन कंपनियों ने सरकार से चीनी इंजीनियर्स और टेक्नीशियन को जल्दी वीजा देने का आग्रह किया है। पीएलआई योजना के तहत जिन इंजीनियर्स का चुना गया है उन्हें वीजा जल्दी देने के लिए बीजिंग में इंडियन एंबेसी तेजी से काम कर रही है।

पीएलआई स्कीम में एपल और सैमसंग जैसी विदेशी कंपनियों के साथ लोकल कंपनी जैसे लावा और माइक्रोमैक्स के लिए अलग-अलग लक्ष्य तय किए हैं। इसमें सालाना इंसेंटिव रेंज 4% और 6% के बीच होगी। पहले फाइनेंशियल ईयर (FY21) में विदेशी कंपनियों को 250 करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत होगी। वहीं, पिछले साल की तुलना में 4,000 करोड़ रुपए के माल का प्रोडक्शन करना होगा। विदेशी कंपनियों द्वारा बनाए गए फोन की इनवॉइस वैल्यू 15,000 रुपए से अधिक होना चाहिए। दूसरी तरफ, भारतीय कंपनियों को 50 करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत होगी। उन्हें पहले साल में 500 करोड़ रुपए के फोन बनाने हैं।

PLI स्कीम में 1.46 लाख करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि मिल रही

पीएलआई स्कीम के तहत केंद्र सरकार अगले 5 साल के दौरान 1.46 लाख करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि देगी। इस योजना के तहत देश में नई यूनिट को स्थापित करने के लिए कंपोनेंट और मशीनरी की जरूरत है। इसका सेटअप चीनी इंजीनियर्स ही कर सकते हैं। हालांकि, कोविड महामारी के चलते इस काम में देरी हो रही है। एक बार चीनी इंजीनियर्स और टेक्नीशियन इन मशीनों को सेट कर देंगे, तब दो साल के अंदर कंपनियां इन्हें खुद संभालने की स्थिति में आ जाएंगी।

एपल का 70% प्रोडक्शन चीन-ताइवान में, लेकिन चीन से शिफ्ट हो रही

कम्पोनेंट की कंपनी और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के निलंबन के कारण भी इस काम में देरी हो रही है। इंडस्ट्री ने अपने पहले साल के प्रोडक्शन लक्ष्य को दूसरे और तीसरे साल में रोल ओवर करने का आग्रह किया है। एपल ने बताया कि उसका लगभग 70 फीसदी प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चर्स द्वारा चीन और ताइवान से होता है। उनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की शिफ्टिंग ताइवान से नहीं, बल्कि चीन से हो रही है।

पीएलआई स्कीम के तहत मिले लक्ष्य को एप्लिकेंट पूरा करने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। उनमें से कई इसे मार्च 2021 तक पूरा कर लेंगे। वहीं, कई फाइनेंशियल ईयर 2021-22 की शुरुआत तक इस पूरा कर पाएंगे। इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (ICEA) ने कहा कि जो PLI एप्लिकेंट 31 मार्च, 2021 से पहले निवेश का लक्ष्य पूरा करते हैं, उन्हें सम्मानित किया जाएगा।


नई शिक्षा नीति पर अमल को सरकार दे सकती है अलग से फंड, शिक्षा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को दिया है प्रस्ताव

नई शिक्षा नीति पर अमल को सरकार दे सकती है अलग से फंड, शिक्षा मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय को दिया है प्रस्ताव

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अमल को लेकर सरकार जिस तरह से पूरी ताकत से जुटी है, उससे साफ है कि इसे आगे बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से बजट में अलग से वित्तीय प्रविधान किए जा सकते हैं। शिक्षा मंत्रालय ने इसे लेकर वित्त मंत्रालय को एक प्रजेंटेशन भी दिया है। इसमें नीति के अमल से जुड़ी जरूरतों को प्रमुखता से रखा गया है। वैसे भी देश की आजादी के 75वें साल यानी वर्ष 2022 में जिस तरह स्कूली बच्चों को नई नीति के तहत किताबें मुहैया कराने जैसे लक्ष्य रखे गए हैं, उसमें ज्यादा जरूरत पैसों की होगी।

खास बात यह है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी सरकार से शिक्षा पर खर्च को दोगुना करने की सिफारिश की गई है। नीति में साफ कहा गया है कि शिक्षा को नई ऊंचाई देने और नीति के अमल के लिए जरूरी है कि शिक्षा पर कुल सरकारी खर्च का बीस फीसद राशि खर्च की जाए। जो मौजूदा समय में कुल सरकारी खर्च का सिर्फ दस फीसद ही है।

मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों की मानें, तो नीति में भले ही शिक्षा पर खर्च में दोगुनी बढ़ोतरी की सिफारिश की गई है, लेकिन यह मौजूदा परिस्थितियों में एक साथ करना संभव नहीं है। यह जरूर है कि यह बढ़ोतरी आने वाले सालों में एक क्रमबद्ध तरीके से की जा सकती है। इसकी शुरुआत सरकार की ओर से इसी साल से की जा सकती है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अमल को लेकर वैसे तो शिक्षा मंत्रालय ने दो क्षेत्रों को चिन्हित किया है। इनमें एक क्षेत्र ऐसा है, जिनमें उन सारी गतिविधियों को शामिल किया गया है, जिनके अमल के लिए पैसों की कोई जरूरत नहीं होगी। बल्कि इन्हें मंत्रालय के स्तर पर प्रशासनिक तरीके से अंजाम दिया जाना है। जबकि दूसरे क्षेत्र में ऐसी गतिविधियों को रखा है, जिसके लिए पैसों की जरूरत होगी।


फिलहाल इनमें जो अमल है, उनमें स्कूली बच्चों को खाने के साथ नाश्ता भी देना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, स्कूली शिक्षा में प्री-स्कूल को शामिल करना, शिक्षकों के खाली पदों को भरना, शोध को बढ़ावा देना, उच्च शिक्षण संस्थानों को विश्वस्तरीय बनाने सहित ऑनलाइन शिक्षा को मजबूती देने जैसे कदम शामिल हैं।

सरकार इस बार शिक्षा नीति के अमल को लेकर कुछ सतर्क भी है, क्योंकि इससे पहले जो नीति बनाई गई, उस पर पैसों के अभाव में ठीक से अमल नहीं हो सका था। हरेक नीति में शिक्षा पर जीडीपी का छह फीसद तक खर्च करने की सिफारिश की गई, लेकिन अभी भी शिक्षा पर जीडीपी के चार फीसद के आसपास खर्च किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में शिक्षा का कुल बजट करीब एक लाख करोड़ रुपये था।


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